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प्राचीन योग और आधुनिक विज्ञान

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आज योग को  विश्व में आत्मज्ञान व आत्मसाक्षात्कार का आधार माना जाता है। निसंदेह भारतीय दर्शन की इस विधा ने आत्मा के ज्ञान को विज्ञान के साथ जोड़ने का काम किया है।  योग हमे स्वस्थ और ख़ुशहाल जीवन जीने की कला सिखाता है। इस पर आप जितना भी कह ले, वो कम ही पड़ जायेगा क्योंकि इसके ज्ञान और लाभ की कोई सीमा नही है, जितना आप अभ्यास करेंगे उतना आप अंतरात्मा के करीब पहुँचते जाएंगे। जब पश्चिमी देश अपनीज़रूरतों को पूरा करने के लिए नए नए आविष्कारों में उलझे हुए थे तब प्रकृति के साथ मिलकर पूरब की हवा और हिमालय की गोद में बैठकर भारतीय ऋषि और मुनि आध्यात्म के ब्रह्मांड में अपनी उपस्थित दर्ज करा चुके थे।

इतिहास गवाह है कि जब से मानव सभ्यता अस्तित्व में आई है तबसे ही आदमी सुख, शांति और स्वाथ्य की खोज में भटकता फिर रहा है।  निसंदेह ‘विज्ञान व तकनीक’ के विकास ने हम सभी को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों और विभिन्न देशों की जीवन शैलियों को एकसाथ जोड़ने और उन्हें अपनाने का काम किया है। आज 21वीं शदी में हम सैटेलाइटस, टेलीविज़न, मोबाइल फोन, कंप्यूटर, इंटरनेट और नृत्य, संगीत, भोजन, फिल्म और जैसे विभिन्न जीवन शैलियों अपने जीवन में शामिल कर चुके है। साथ ही साथ हम दुनिया की बेहतरीन सिस्टम्स को खुशीपूर्वक स्वीकार भी कर रहे हैं। आज इसमें कोई संदेह नहीं है कि विज्ञान और तकनीक के बेहताशा विकास ने हर स्तर पर लोगों की जीवन शैली को ऊंचा उठाने की कोशिश की है मगर लोगों में शरीर और इंद्रियों के सुख को बिना मेहनत और कार्य किए हासिल करने की होड़ भी पैदा की है। परिणामस्वरूप आनंद और विलासिता जैसी आदतों को भी प्रोत्साहन के साथ साथ उन्हें किसी भी तरह हासिल करने की इच्छा भी लोगो के मन पैदा की है।  विज्ञान और तकनीक के इस विकास ने,एक ऐसे  दौर की शुरुआत की है जिसने शरीर को आलसी और मन को इतना थका दिया कि तनाव और तनाव से जन्मी बीमारियों के साथ-साथ परमाणु हथियारों की होड़, आतंकवाद और मानवीय मूल्यों को भी पीछे छोड़ दिया है।  विज्ञान के अनुसंधान कुछ भी तर्क दें मगर मानव सभ्यता और प्रकृति के शोषण में भी विज्ञान की इस भूमिका को भी हम कभी नहीं भूल पाएगें।

आज विज्ञान और तकनीकी का विकास का सबसे बुरा पहेलू सामने आरहा है कि विज्ञान स्वाभाविक मानवीय प्र्कृति को एक बनाबटी वातावरण में कन्वर्ट कर रहा है। इस कारण विज्ञान एक मनुष्य को आत्म-ज्ञान, भावनात्मकस्थिरता, आत्म-संतुलन और नैतिक अनुशासन कभी नहीं दे पाया और नतीजतन, इतने बड़े तकनीक के दौर में एक आदमी आज भी शांति और खुशी की तलाश में है भटकता फिर रहा है।  आज योग ही एक ऐसा विज्ञान है जो प्रत्येक स्तर पर मनुष्य के जीवन को सहजता के साथ छूता है और हमें आत्म-ज्ञान, भावनात्मकस्थिरता, आत्म-संतुलन और नैतिक अनुशासन दे सकता है। आज सम्मपूर्ण मानव समुदाय और विश्व को योग की विशेष आवश्यकता है, हम सभी एक साथ जुड़ें और योग को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाने मदद करें जिससे कि लोग अपने जीवन के मूल्यों को समझें और स्वस्थ व तनावमुक्त जीवन जी सकें। इसे हम ‘योग’सबसे बड़ा दान या ‘योगदान’ कह सकते है।

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